नोटबंदी के पीछे क्या है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को रात्रि आठ बजे नोटबंदी की घोषणा करते हुए कहा कि पांच सौ और हजार रुपए के नोट बंद करने से काला धन बाहर आएगा, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, आतंकवादियों के आर्थिक स्रोत बंद होंगे और सीमा पार से आने वाली नकली करंसी पर रोक लगेगी। इस नोटबंदी के पीछे जो असली कारण है उसे मोदी सरकार के साथ-साथ कॉरपोरेट मीडिया ने पूरी तरह छिपा लिया है। वर्तमान नोटबंदी, बैंकों के पास नकदी की कमी का संकट है। यह संकट इतना गहरा है कि अगर प्रभावशाली कदम नही उठाया जाता है तो बैंक दीवालिया हो सकते हैं। बैंकाें को रोजाना 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपए की नकदी की कमी से जूझना पड़ रहा है। रिजर्व बैंक इस पूंजी तरलता को बनाए रखने के लिए बार-बार नकदी डालता है। अभी-अभी ही उसने 25 हजार करोड़ रुपए की नकदी बैंको में डाली है।

यह संकट एक दिन में पैदा नही हुआ है। 1991 में नई आर्थिक नीति लागू किए जाने के बाद से ही राजनेताओं, उद्योगपतियों और बैंक नौकरशाहों का एक अपवित्र गठबंधन बन चुका था जो बैंक-सुधार के नाम पर बैंकाें के सामाजिक स्वामित्व को बदलने, उनका निजीकरण करने और उसमें जमा पूंजी को हड़पने की कोशिश में लग गया था। हर्षद मेहता और केतन पारिख जैसे शेयर दलालों ने घोटालों को अंजाम देने के लिए बैंक अधिकारियों से मिलकर बैंक पूंजी का ही इस्तेमाल किया था। स्मरण रहे कि नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताने वाले हमारे वित्तमंत्री अरुण जेटली शेयर घोटालेबाज केतन पारिख को बचाने के लिए सुप्रिम कोर्ट में उसका मुकदमा लड़ रहे थे।
1991 में बनी नरसिम्हन कमेटी से लेकर 2014 में रिपोर्ट देने वाली पी-जे-नायक कमेटी तक भारत की इस मजबूत बैंकिंग व्यवस्था को ही ढाने में लगी हुई थी। इसी का नतीजा था कि बैंक में नकदी की कमी इस हद तक हो गई कि उस कमी को पूरा करने के लिए नोटबंदी का सहारा लेना पड़ा। यह नकदी की कमी कैसे हुई आइए इसे जानने की कोशिश करते हैं।
मान लें कि किसी बैंक के पास लोगों की बचत के 100 रुपए रखे हैं। इन सौ रुपए में से 80 रुपए वह उधार दे देता है। इस उधार दिए 80 रुपए में 40 रुपए कर्ज लेने वाले मार कर बैठ जाते हैं। वह लोग उधार लिए इन 40 रुपए पर न तो ब्याज चुका रहे हैं और न ही मूलधन वापस कर रहे हैं। इस स्थिति में बैंक के पास जो 100 रुपए की नकदी थी उसमें से 40 रुपए की नकदी कम हो जाती है। अब उसे अपना व्यापार चलाने के लिए 60 रुपए से ही काम चलाना पड़ रहा है। इस तरह उसका व्यापार आधा रह जाता है और उसे घाटा होने लगता है। अभी-अभी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने जो अपने तिमाही के परिणाम घोषित किए हैं उसमें पिछले वर्ष की तिमाही की तुलना में इस वर्ष सितंबर 2016 की तिमाही में 99-6 प्रतिशत का घाटा हुआ है। पिछले साल 4491-70 करोड़ मुनाफा था जो इस साल घट कर केवल 20-7 करोड़ रुपए रह गया। यह घाटा मारे गए कर्ज जिसे एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट) कहा जाता है में तीन गुना वृद्धि होने से हुआ। ऐसा खराब कर्ज जिसपर न तो ब्याज मिल रहा है और न ही मूल वापस आ रहा है वह पिछले साल 5330-96 करोड़ रुपए था जो इस साल 15326-91 करोड़ रुपए हो गया।
बैंकाें पर नकदी की कमी का कारण ऐसा खराब कर्ज या एनपीए है जो लगभग 12 लाख करोड़ रुपए तक पंहुचने का अनुमान है। इतना पैसा बैंकों से निकल कर विजय माल्या जैसे उद्योगपतियों के पास चला गया जिसे उन्हाेंने खर्च कर डाला। अब उस पैसे से खरीदा गया सामान, संपत्ति और मजदूरों-कर्मचारियों के श्रम का फल तो विजय माल्या जैसों के पास है लेकिन बैंकाें को उससे कुछ भी हासिल नहीं हो रहा है। इस तरह इतनी बड़ी नकदी बैंकों के पास से निकल कर बाजार में पंहुच गई लेकिन उससे बैंकाें को कोई फायदा नहीं हो रहा है। अमेरिका में 2008 में जो मकान-गिरवी संकट आया था उसमें भी यही हुआ था कि गृह-ट्टण के नाम पर जो कर्ज दिया गया था उसकी वसूली बंद हो गई और इस तरह बैंकों पर नकदी की कमी हो गई। जब लोगों को यह पता चला तो जिनका पैसा बैंकाें में जमा था वह अपना पैसा निकालने के लिए बैंको में कतारों में खड़े हो गए लेकिन बैंकाें के पास नकदी थी ही नहीं इसलिए ऐसे बैंको ने खुद को दीवालिया घोषित कर दिया। इसके बाद ही बासेल कमेटी ऑन बैंकिंग सुपरवीज़न ने बासिल-3 के लिए बैंकाें में नकदी की निर्धारित मात्र रखने के नियम बनाए और उन्हें लागू करने के लिए 1 जनवरी 2013 की तारीख रखी तथा पूरी तरह अमल में लाने की तारीख 1 जनवरी 2019 तय की।
अमेरिका की ही तरह भारत में भी यही हुआ है कि बैंकों ने ऐसे उद्योगपतियों को बड़े पैमाने पर कर्ज बांटे हैं जो उसे मार कर बैठ गए हैं और उससे नकदी की कमी हो गई है। अब नकदी की कमी के इस संकट से निबटने का एक तरीका यह था कि जानबूझ कर बैंकाें का पैसा मारे उद्योगपतियों की संपत्ति जब्त की जाती, सहारा के मालिक सुब्रतो राय की तरह उन्हें जेल में डाला जाता लेकिन मोदी सरकार तो ऐसे डिफाल्टरों को आराम से भारत छोड़ने में मदद कर रही है। तब सरकार ने इस संकट को जनता पर स्थानांतरित करने का निर्णय किया और वर्तमान नोटबंदी ऐसा ही कदम है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अनुसार बैंकों पर कुल करंसी 86-4 लाख करोड़ रुपए थी जिसमें से 86 प्रतिशत यानी लगभग 15 लाख करोड़ रुपए एक हजार व पांच सौ के नोटों के रूप में थी। इन नोटों को बंद करने से एक झटके में सरकार के पास उतनी नकदी छापने का अधिकार आ गया। सरकार को अब इस बात की चिंता नहीं है कि जनता के बीच जो पांच सौ या हजार रुपए के नोटों के रूप में काली या सफेद नकदी है वह बैंक में जमा हो या नही हो। उसकी कोशिश है कि बैंकों से कम से कम नकदी की निकासी हो ताकि बैंकाें के पास पूंजी तरलता बनी रहे। यही कारण है कि नोटबंदी से पहले जानबूझ कर छोटे या बड़े नोटों को नही छापा गया। पुराने नोटों को जमा करने की सीमा ढाई लाख रुपए निर्धाारित की गई। अगर यह छूट दे दी जाती कि जनता एक नाम पर ढाई लाख रुपए से ज्यादा जमा कर सकती है तो काफी करंसी जमा हो सकती थी लेकिन सरकार पर उसकी देनदारी बन जाती। ढाई लाख रुपए की सीमा लगाए जाने से सरकार की देनदारी कम हो जाएगी। जो पहले 4000 रुपए बदलने की सीमा लगाई गई थी उसे पांच सौ बढ़ाया गया लेकिन जब लोग जमा करने लगे तो सरकार ने तुरत उसको घटाकर 2000 कर दिया। जब एक खाते में ढाई लाख रुपए के पुराने नोट जमा करने की छूट है तो उसको उतनी ही राशि निकालने की भी छूट मिलनी चाहिए लेकिन सरकार का मकसद बैंकाें से कम से कम निकासी को बनाए रखना है। मान लीजिए पुराने बैंक नोट जमा करने की निर्धारित अवधि में इन पन्द्रह लाख करोड़ रुपए के बड़े नोटों में से केवल पांच या सात लाख करोड़ रुपए ही जमा होते हैं तब जमा न हुए नोटों का लाभ सरकार को ही मिलेगा क्योंकि पुराने नोट अगर कागज बन जाते हैं तो जिनके पास वह रह गए होंगे उनका नुकसान होगा लेकिन इससे सरकार का फायदा होगा क्योंकि सरकार उतने नए नोट छाप कर जो नकदी अपने पास रख लेगी उसको उसे किसी को देना नही पड़ेगा।
नोटों की किल्लत बनाए रखने के पीछे यही मंशा काम कर रही है। हां, इससे किसको फायदा और किसको नुकसान होने जा रहा है इसका जायजा लेते हैं। मान लें कि किसी बैंक के पास एक लाख रुपए की नकदी थी और उसमें से खराब कर्ज यानी एनपीए कुल कर्ज का 5 प्रतिशत था। अब जब बैंक के पास दो लाख रुपए की नकदी आ गई है तो एनपीए अपने आप ढाई प्रतिशत हो जाएगा। इस तरह बढ़े बकायादारों से वसूलने का दबाव कम हो जाएगा और बैंकें जब ब्याज दर कम करेंगी तो जमाकर्ता को तो भारी घाटा उठाना पड़ेगा जबकि बड़े कर्जदारों को ब्याज दर घटने से बड़ा फायदा होगा।
कुल मिलाकर मोदी सरकार के इस कदम से बैंकों का पैसा मारे बैठे उद्योगपतियों को भारी लाभ पंहुचने वाला है और आम जनता को परेशानी, मौत और तनाव का सामना करना पड़ेगा। हां, जो समय चुना है उसमें यह बात भी छिपी है कि इससे स्थानीय छोटी राजनीतिक पार्टियों को दिक्कत का सामना करना पड़ेगा और इस तरह पंजाब और यूपी के चुनाव में मोदी सरकार जीत जाएगी लेकिन गुजरात और महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनाव में जिस तरह भाजपा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है, इस नोटबंदी के बाद भाजपा की कुछ वैसी ही हालत 2017 में होने वाले विधान सभा चुनावों में हो सकती है।