ज्ञान, शिक्षा तथा वर्चस्व

‘‘हर ऐतिहासिक युग में शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार होते हैं, यानी समाज की भौतिक शक्तियों पर जिस वर्ग का शासन होता है वही बौद्धिक शक्तियों पर भी शासन करता है। भौतिक उत्पादन के साधन जिसके नियंत्रण में होते हैं, बौद्धिक उत्पादन के साधनों पर भी उसी का नियंत्रण रहता है, जिसके चलते सामान्यतः बौद्धिक उत्पादन के साधन से वंचितों के विचार इन्हीं विचारों के अधीन रहते हैं।’’ (कार्ल मार्क्स, जर्मन विचारधारा)

कार्ल मार्क्स का उपरोक्त कथन आज नवउदारवादी संदर्भ में कम-से-कम उतना ही प्रासंगिक है जितना 1845 में इसके लिखे जाने के वक्त। शासक वर्ग का विचार ही युग का विचार या युग चेतना होता है। युगचेतना यानी खास देश-काल की विचारधारा मिथ्या चेतना होती है क्योंकि यह एक खास संरचना को शाश्वत, सार्वभौमिक तथा अंतिम सत्य के रूप में प्रतिस्थापित करने का प्रयास करती है।आज अस्तित्व की चुनौती से जूझ रहा ब्राह्मणवाद हजार साल से अधिक समय तक भारतीय उपमहाद्वीप के ज्यादातर भूखंडों में युग चेतना बना रहा जिसे गुरुकुलों की शिक्षा द्वारा परिभाषित ज्ञान पालता पोषता रहा। शिक्षा संस्थान बौद्धिक उत्पादन के सबसे महत्वपूर्ण कारखाने हैं। 1995 में विश्व बैंक ने शिक्षा को एक व्यापारिक सेवा के रूप में गैट्स (जनरल ऐग्रीमेंट ऑन ट्रेड ऐंड सर्विसेज) में शामिल कर लिया है। वैसे मनमोहन सरकार भी इस दस्तावेज पर दस्तखत करने को सिद्धांततः सहमत थी लेकिन किया मोदी सरकार ने। दोनों विश्व बैंक की मातहती में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। शासक वर्ग समाज के मुख्य अंतर्विरोध की धार को कुंद करने के लिए राज्य के वैचारिक उपकरणों से अपने आंतरिक अंतर्विरोधों को समाज के मुख्य अंतर्विरोध के रूप में प्रचारित करता है। उच्च शिक्षा संस्थानों पर तमाम तरीकों से जारी हमला गैट्स को लागू कर शिक्षा को पूरी तरह कॉरपोरेटी भूमंडलीय पूंजी के हवाले करने की भूमिका है। गैट्स के विभिन्न प्रावधानों की चर्चा की गुंजाइश (स्कोप) यहां नहीं है लेकिन खेल के सम मैदान (लेबेल प्लेइंग फील्ड) की संक्षिप्त चर्चा अप्रासंगिक नहीं होगी। यानी अगर सरकार दिल्ली विश्वविद्यालय को अनुदान देती है तो लब्ली विश्वविद्यालय को भी दे नहीं तो दिल्ली विश्वविद्यालय का भी अनुदान बंद करे। जब तक सार्वजनिक वित्त पोषित संस्थान रहेंगे तो निजी खिलाड़ियों के ‘खुले’ खेल में दिक्कत होगी। इनकी दुकानें तब तक उतनी सुचारु रूप से नहीं चल पाएंगी जब तक सार्वजनिक वित्तपोषित संस्थाएं खत्म नहीं हो जातीं। सरकार और आरएसएसी ब्राह्मणवाद इसी प्रयास में लगे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय तथा अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक मानव संसाधन मंत्रलय और रीढ़विहीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के तुगलकी फरमानों के खिलाफ महीनों से आंदोलित हैं। भविष्य बताएगा कि शिक्षक-छात्रें का प्रतिरोध सरकार की शिक्षा-विरोधी मुहिम को रोक पाएगा कि नहीं।
चुनावी ध्रुवीकरण के गुजरात प्रयोग के महानायक नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता पर काबिज होते ही आरएसएस ने अपने संसदीय और ‘असंसदीय’ घटकों के माध्यम से उच्च शिक्षा तथा उच्च शिक्षा संस्थानों पर हमला बोल दिया। भारत को माता मानने वाले को ही शिक्षित मानने वाली, मानव संसाधन मंत्री, स्मृति इरानी ने शिक्षा में आमूल परिवर्तन के संकेत दिए हैं। हिंदुत्व के प्रथम परिभाषक वीडी सावरकर मातृभूमि की नहीं पितृभूमि की बात करते हैं। भारत को पिता मानने वाले सावरकर को ये शिक्षित मानती हैं कि नहीं, वही जानें। सरकार की मौजूदा नीतियां शिक्षा के भगवाकरण की द्योतक हैं जैसा कि राजस्थान के शिक्षामंत्री ने साफ साफ कहा है कि उनकी सरकार शिक्षा के भगवाकरण के लिए कटिबद्ध है। आगरा में विश्व हिंदू परिषद के मंच से मुसलमानों के सफाया की गुहार लगाने के लिए चर्चा में आए केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री ने साफ साफ कह दिया, ‘‘हिंदुस्तान में नहीं तो क्या पाकिस्तान में भगवाकरण होगा?’’ यहां मकसद भगवाकरण की अंतर्वस्तु की व्याख्या नहीं है, वह एक अगल चर्चा का विषय है। सरकार की नई शिक्षा नीति तथा इस सरकार का शिक्षा संस्थानों में स्थापित जनतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला भी इस का मकसद नहीं है, वह भी एक अलग चर्चा का विषय है। इस लेख का विचार इस जिज्ञासा से उभरा कि क्यों सभी ऐतिहासिक युगों में शासक वर्ग और उनके ‘जैविक’ बुद्धिजीवी ज्ञान को शिक्षा के माध्यम से एक खास ढांचे में परिभाषित करते हैं और शिक्षा पर एकाधिकार कायम करते हैं? क्या शिक्षा और ज्ञान मे कोई समानुपाती रिश्ता है? इन्ही सवालों के जवाब की तलाश में इसमें शिक्षा तथा शासक वर्ग के वैचारिक वर्चस्व के अंतर्संबंधों पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में एक चर्चा का प्रयास किया गया है।
लगता है ज्ञान तथा शैक्षणिक डिग्री में समानुपातिक संबंधों की मान्यता के चलते भारत के प्रधानमंत्री तथा मानव संसाधन मंत्री की डिग्रियां विवाद के घेरे में हैं। आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने दिल्ली विश्वविद्यालय से मोदीजी और स्मृति इरानी जी के पंजीकरण तथा परीक्षा संबंधित दस्तावेज मांगे हैं। अखबारों की खबरों से पता चला कि दिल्ली विश्वविद्यालय को स्मृति इरानी के दस्तावेज मिल ही नहीं रहे। अरुण जेटली ने जो डिग्री और मार्क्सशीट मीडिया को दिखाया उनके नामों और रोल नंबरों में विसंगतियां हैं। गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति ने मीडिया में मोदी जी की ‘‘संपूर्ण राजनीतिशास्त्र (एंटायर पोलिटिकल साइंस)’’ में एमए की डिग्री पेश की। यह अलग बात है कि दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय में इस नाम का विषय नहीं दर्ज है। इस विवाद पर मोदी जी का मन मौन है। यहां मकसद इनकी शैक्षणिक योग्यता पर चर्चा नहीं है, न ही इस बात पर कि झूठा हलफनामा भारतीय दंड संहिता की किस धारा में आता है। अगर उन्होंने सचमुच हलफनामे में सच बोला है तो अपनी डिग्रियां व मार्क्सशीट सार्वजनिक क्यों नहीं करते? यह भी इस लेख की चर्चा का विषय नहीं है। मोदी जी के राजनैतिक कौशल को कोई चुनौती नहीं दे सकता क्योंकि गोधरा के प्रायोजन से शुरू कर दिल्ली के तख्त की राजनैतिक यात्र का वृत्तांत उसकी काट के रूप में मौजूद है। इस विवाद के जिक्र का यहां मकसद महज इस बात की ओर इंगित करना है कि इन्हें अपने ज्ञान की वैधता के लिए शैक्षणिक योग्यता का तथाकथित फर्जी बयान क्यों जरूरी लगा? क्या शिक्षा और ‘‘ज्ञान’’ के अंतःसंबध इतने गहन हैं? क्यों यह सरकार एक-एक कर उच्च-शिक्षा परिसरों को साम-दाम-भेद-दंड से खास रंग में रंगना चाहती है? क्यों सरकार तथा आरएसएस के सभी भोंपू नारों से देशभक्ति और देशद्रोह परिभाषित करना चाहते है? इतिहास के इस अंधे मोड़ पर जब कॉरपोरेटी फासीवाद आक्रामक रूप से मुखर हो, इन सवालों पर विमर्श जरूरी हो गया है।
फेसबुक पर एक अमेरिकी ने एक पोस्टर शेयर किया था, ‘‘ट्रंप को रोकना समाधान नहीं है_ समाधान उस शिक्षा प्रणाली को खारिज करना है, जो इतने ट्रंप समर्थक पैदा करती है।’’ देश में मोदी-भक्तों में उच्च-शिक्षितों की संख्या देखते हुए यही बात हमारी शिक्षा पद्धति पर भी लागू होती है। 2014 के चुनाव में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों का बहुमत, विकास पुरुष के गुणगान कर रहा था। संस्थागत परिभाषा में प्रोफेसर सर्वाेच्च ज्ञानी माना जाता है। जिससे भी पूछता था कि भाई, अपने आराध्य का एक गुण बता दीजिए जिसके चलते वे उन्हें देश का उद्धारक, दिव्य पुरुष लगते हैं? उनका वही जवाब होता था जो वास्तविक तथा फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में बजरंगी लंपटों का। ‘‘16 मई को बताएंगे।’’ मुझे तरस आता था सर्वाेच्च शिक्षित इन प्रोफेसरों पर कि सामाजिक विश्लेषण में एक प्रोफेसर तथा बजरंगी लंपट में कोई फर्क नहीं है क्या? इस तरह का पूर्वाग्रह-दुराग्रह तथा कुतर्क ज्ञान हो सकता है क्या? यदि नहीं तो क्या शिक्षा और ज्ञान में कोई समानुपातिक संबंध है?
ज्ञान तथा शिक्षा के अंतःसंबंधों के इतिहास पर दृष्टिपात के पहले आइए जरा कुछ सर्वाेच्च शिक्षित समूहों पर एक उड़ती नजर डालते हैं। अंधविश्वासों, धार्मिक पूर्वाग्रह-दुराग्रहों तथा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुहिम चलाने वाले दाभोलकर की हत्या का मुख्य आरोपी तवाड़े विशेषज्ञ डाक्टर है, जहालत से नफरत तक का मसीहा विहिप का नेता तोगड़िया भी डाक्टर है। कुछ साल पहले देहरादून के आईआईटी से उच्च शिक्षा प्राप्त एक व्यक्ति द्वारा अपनी पत्नी की हत्या के बाद लाश को बोटी-बोटी करके रेफ्रीजरेटर में रख कर ‘वैज्ञानिक तरीके’ से किस्तों में ठिकाने लगाने की खबर छपी थी। इसी तरह की खबर दिल्ली में मुनीरका में रहने वाले एक अन्य आईआईटियन के बारे में छपी थी। सर्वविदित है कि गुजरात के दर्जनों आईपीएस/आईएएस अपनी संवैधानिक भूमिका निभाने की बजाय अमानवीय जनसंहार की देख-रेख और मोदी सरकार के इशारों पर, मंत्रियों के निजी चाकरों की तरह मासूमों को फर्जी मुठभेड़ों में मार रहे थे। ये उदाहरण इस लिए दिया जा रहे हैं कि इन संस्थानों तथा सेवाओं में, माना जाता है कि देश की प्रतिभा की मलाई जाती है। जिस समाज की उच्च शिक्षित मलाई इतनी अमानवीय हो तो तलछट कैसा होगा, आसानी से समझा जा सकता है। यदि ज्ञान का मतलब मानवीय परिप्रेक्ष्य में समाज की वैज्ञानिक समझ और उसकी भलाई से है तो उच्च शिक्षित अमानवीयता के अथाह सागर के चंद प्यालों की ये मिसालें शिक्षा और ज्ञान के बीच समानुपातिक संबंध के सिद्धांत को खारिज करती हैं।
ज्ञान का इतिहास शिक्षा के इतिहास से पुराना है। आदिम कुनबों तथा कबीलों में ज्ञानी माने जाने वाले ही कबीले का मुखिया, पुजारी या सेनापति होते थे। मानव जाति ने भाषा, आग, धातुविज्ञान, पशुपालन, विनिमय/विपणन तथा आत्मघाती युद्ध का ज्ञान किसी भी शिक्षा व्यवस्था के पहले ही हासिल कर लिया था। प्रकृति से अनवरत संवाद से अर्जित अनुभवों तथा प्रकृति के साथ प्रयोगों और उनपर चिंतन-मनन से मनुष्य अनवरत रूप से प्रकृति के तमाम उपहारों और प्रक्रियाओं के बारे में ज्ञानाजर्न करता रहा है तथा इसके माध्यम से श्रम के साधनों का विकास। इसीलिए कोई अंतिम ज्ञान नहीं होता बल्कि ज्ञान एक अनवरत प्रक्रिया है। हर पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की उपलब्धियों को समेकित कर उसे आगे बढ़ाती है। तकनीकी प्रगति के साथ उत्पादक शक्तियों का विकास आदिम सामुदायिक उत्पादन प्रणाली के बस की नहीं रही। भरण-पोषण से अतिरिक्त उत्पादन की अर्थव्यस्था ने निजी संपत्ति को जन्म दिया। कबीलाई जिंदगी के बिखराव के दौर में, सामूहिक संपत्ति के बंटवारे में ज्ञानियों की चतुराई से सामाजिक असमान वर्ग-विभाजन के बाद वर्चस्वशाली वर्गों ने वर्चस्व की वैधता के लिए ज्ञान को अपने वर्गहित में परिभाषित किया। ज्ञान की इस सीमित परिभाषा को ही अंतिम ज्ञान के रूप में समाज पर थोपने के मकसद से ज्ञान को शिक्षाजन्य बना देशकाल के अनुकूल शिक्षा प्रणालियों की शुरुआत की। मार्क्स के उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि पूंजीवाद महज उपभोक्ता माल का ही नहीं, विचारों का भी उत्पादन करता है। शासक वर्ग के विचारक, शासक विचारों को राज्य के वैचारिक उपकरणों से अंतिम सत्य बता युग के विचार के रूप में प्रतिष्ठित कर युग चेतना का निर्माण करते हैं। ये विचार प्रकारांतर से यथास्थिति को यथासंभव सर्वाेचित तथा सर्वाधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था के रूप में स्थापित करते हैं।
इस तरह की मिथ्या चेतना का निर्माण जरूरी नहीं कि छल-कपट के भाव से किया जाता हो। प्रायः ये बुद्धिजीवी खुद को धोखा देते हैं, क्योंकि वे खुद मिथ्या को सच मानने लगते हैं। तेजस विमान की सफलता के लिए सत्यनारायण की कथा कहने वाला वह पुजारी जरूरी नहीं है कि जानबूझ कर छल कर रहा है बल्कि ज्यादा संभावना है कि वह खुद को धोखे में रखता है। उसे खुद भी विश्वास है कि इस वैज्ञानिक उपक्रम को अंधविश्वासी कर्मकांडों से ही सफल बनाया जा सकता है। पूंजीवादी बुद्धिजीवी तमाम तर्क-कुतर्कों से बताते हैं कि पूंजीवाद ही सर्वाेत्तम व्यवस्था है जिसमें हर किसी को योग्यतानुसार पुरस्कृत या दंडित किया जाता है। समाजवाद वगैरह के विकल्प अव्यावहारिक हैं और असफल साबित हो चुके हैं। जाने-माने मार्क्सवादी विचारक ऐंतोनियो ग्राम्सी ने अपने वर्चस्व के सिद्धांत में खूबसूरती से दर्शाया है कि किस तरह युगचेतना के प्रभाव में, शोषित सहमति से शोषित होता है। शासक वर्गों के हाथ में संस्थागत शिक्षा युगचेतना के निर्माण का एक प्रमुख उपकरण है। यह ज्ञान को परिभाषित और सीमित करती है। प्राचीन कालीन यूनानी चिंतक अरस्तू शिक्षा की भूमिका नागरिकों में खास ढंग से, सोचने की आदत डालना तय करता है। इसीलिए सभी सरकारें शिक्षा के अनुकूलन का प्रयास करती हैं। आधुनिक शिक्षा में शैक्षणिक डिग्रियों को आम तौर पर किसी के ज्ञान का मान दंड मान लिया जाता है। उच्च शिक्षित भक्तों की भीड़ देख, लगता है कि पढ़े-लिखे अज्ञानियों का प्रतिशत काफी है।
कृषि तथा शिल्प के विकास के साथ हमारे अर्धखानाबदोश ट्टगवैदिक पूर्वजों की पशुपालन की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित हो गयी और वे स्थाई गांवों में रहने लगे। कुछ चतुर-चालाक लोगों ने श्रम विभाजन के नाम पर समाज को श्रमजीवी और परजीवी वर्गों (वर्णों) में बांटकर पवित्रता-अपवित्रता के सिद्धांत गढ़कर जन्मजात बना दिया। वर्णाश्रम व्यवस्था के औचित्य तथा वैधता के लिए ग्रंथ लिखे गये जिन्हें ज्ञान का स्रोत मान लिया गया। अमानवीय वर्गविभाजन को दैविक रूप देकर शासक वर्गों (वर्णों) के हित में युगचेतना के निर्माण के लिए शिक्षा की गुरुकुल प्रणाली शुरू हुई। जन्मजात श्रेणीबद्ध वर्ग विभाजन के औचित्य के लिए तमाम दैवीय मिथ गढ़े गये। इहलोक-उहलोक की दैविक जुमलेबाजी के साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति के रूप में सर्जक, रक्षक तथा संहारक देवताओं की गल्प कथाएं गढ़ी गयीं। इन गल्प कथाओं को सुस्थापित करने के भूलोक तथा देवलोक के बिचौलिए नारद नामक कल्पित चरित्र को सूत्रधार बनाकर पुराणों की रचना हुई। वेद-पुराण ही गुरुकुलों के पाठ्यक्रम में प्रमुख थे। इन मिथकीय ग्रंथों के जरिए वेद-हल का द्वंद्व खड़ा किया गया। ईश्वर ने कुछ लोगों को हल चलाने के लिए बनाया है, कुछ को वेद पढ़ने के लिए और एक दूसरे के क्षेत्र में अतिक्रमण दैविक वर्जना थी। मनुस्मृति में साफ लिखा है कि स्त्री या शूद्र गलती से भी वेदमंत्र सुन लें तो उनके कानों में पिघलता सीसा उड़ेल देना चाहिए। यानी ज्ञान वही है जो शिक्षा बताए और शिक्षा में सवर्ण पुरुषों का 100 प्रतिशत आरक्षण।
समूचे प्राचीन तथा मध्ययुगीन इतिहास में, समतामूलक बौद्ध समुदायों को छोड़ दें तो शिक्षा तथा ज्ञान की दावेदारी शासित वर्गों के लिए वर्जना ही रही है। मुगलकाल के पहले शिक्षा का माध्यम संस्कृत थी। शूद्रों तथा महिलाओं द्वारा शिक्षा का प्रयास घोर दंडनीय अपराध था। आम जन की भाषा पाली में लिखे बौद्ध ग्रंथों तथा बौद्ध संघों की जनतांत्रिक शिक्षा प्रणाली की मिसाल छोड़ दिया जाय, तो प्राचीन तथा मध्यकालीन इतिहास में शायद ही कहीं आमजन की भाषा ज्ञान की भाषा या शिक्षा का माध्यम रही हो। इंगलैंड में कैंब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों में क्रमशः 1892 और 1894 में विषय तथा शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को शामिल किया गया। गौर तलब है कि इंग्लैंड के निम्न वर्गों ने लंबे संघर्ष के बाद 1880 के दशक में मताधिकार हासिल किया था। भारत में अंग्रेजी शासक भाषा थी, इंग्लैंड में आमजन की। मुगलकाल में शासकीय भाषा फारसी होने से ज्ञान की भाषा बन गयी। ‘पढ़े फारसी बेचे तेल, ये देखो कुदरत का खेल’ एक मशहूर कहावत है। चूंकि मध्य युग में सत्ता की वैधता का स्रोत ईश्वर था तथा धर्म वैधता की विचारधारा, धर्म-ग्रंथो में वर्णित ज्ञान ही ज्ञान था एवं धर्म ग्रंथों का अध्ययन ही शिक्षा का विषय। इसलिए पाठशालाओं तथा मदरसों पर क्रमशः धर्मनिष्ठ ब्राह्मण आचार्यों तथा मौलवियों का नियंत्रण होता था। औपनिवेशिक शासन में अंग्रेजी शिक्षा और ज्ञान की भाषा बन गयी। शिक्षा के सार्वभौमिक संवैधानिक प्रावधान से शिक्षा की ब्राह्मणवादी वर्जनाएं खत्म हुईं। राजकीय तथा केंद्रीय विश्वविद्यालयों तथा अन्य उच्च शिक्षा के संस्थानों में वंचित तबकों के लड़के-लड़कियां पहुंचने लगे। शिक्षा के जरिए ज्ञान पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी। विश्व बैंक की इच्छा के अनुकूल, शिक्षा को प्रकारांतर से पूर्णरूपेण व्यावसायिक सामग्री बनाकर, सरकार की नई शिक्षा नीति नये तरह की वंचना तथा वर्जना की साजिश है। सिर्फ अमीर ही शिक्षा प्राप्त कर सकेगा। गरीबों को भी शिक्षा चाहिए तो कर्ज लेकर पढ़े जिसे चुकाने के लिए भविष्य गिरवी रखना पड़ेगा।
प्राचीन यूनान में प्लेटो की ‘एकेडमी’ की स्थापना के पहले अमीर नागरिक अपने बच्चों की शिक्षा की निजी व्यवस्था करते थे। प्लेटो की एकेडमी पहला सार्वजनिक शिक्षा संस्थान था। प्लेटो के ग्रंथ रिपब्लिक में शिक्षा को इतना अधिक स्थान दिया गया है कि जन-संप्रभुता के सिद्धांत के प्रवर्तक 18वीं शताब्दी के दार्शनिक रूसो ने उसे शिक्षा पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ बताया है। कथनी-करनी के अंतर्विरोध का दोगलापन पूंजीवाद की ही नहीं, वर्ग समाजों के इतिहास का अभिन्न हिस्सा रहा है। यह दोगलापन सर्वाधिक उसकी शिक्षा व्यवस्था में परिलक्षित होता है। एक तरफ प्लेटो कहता है कि शिक्षा का काम विद्यार्थी को बाहर से ज्ञान देना नहीं है। मस्तिष्क गतिशील है तथा उसके पास अपनी आंखें हैं। शिक्षा काम सिर्फ प्रकाश दिखाना है, यानी मस्तिष्क की गतिशीलता के लिए परिवेश (एक्सपोजर) प्रदान करना है। वह खुद-ब-खुद ज्ञान के विचारों की तरफ चुंबकीय प्रभाव से आकर्षित होगा। दूसरी तरफ जन्म से ही शुरू होने वाली शिक्षा व्यवस्था के लिए सख्त पाठ्यक्रम की योजना पेश करता है, सख्त सेंसरशिप से चुनी गयी विषय वस्तु के साथ। वर्णाश्रम की तर्ज पर उसके आदर्श राज्य में ज्ञानी राजा होगा। शिक्षा के माध्यम से श्रम (वर्ग) विभाजन होता है। ज्ञानी (दार्शनिक) राज करता है_ साहसी सैनिक होता है तथा बाकी भिन्न-भिन्न आर्थिक उत्पादन का काम करते हैं। जैसे ब्रह्मा ने विभिन्न लोगों को अपने शरीर के विभिन्न अंगों से पैदा करके सामाजिक असमानता का निर्माण किया वैसे ही प्लेटो का दार्शनिक राजा यह मिथ फैलाता है कि ईश्वर ने लोगों को सोना, चांदी और पीतल-तांबे जैसे तुच्छ धातुओं के गुणों के साथ पैदा किया है जो कि अपरिवर्तनीय है। सोने के गुण वाला दार्शनिक राजा होता है, चांदी वाला सैनिक और तांबे पीतल वाले आर्थिक उत्पादक। अंधकार युग कहे जाने वाले मध्ययुग में और जगहों की तरह यूरोप में भी सत्ता की वैधता का स्रोत ईश्वर था तथा धर्म उसकी विचारधारा। धार्मिक ज्ञान ही ज्ञान था तथा पादरी ही शिक्षक भी था और ज्ञान की परिभाषा का ठेकेदार भी। धार्मिक शिक्षा के ज्ञान के अतिक्रमण के ‘अपराध’ में वैज्ञानिक ब्रूनो को सन 1600 में जिंदा जला दिया गया था। कैथलिक आस्था की कई बुनियादी मान्यताओं के खंडन के आरोप में उनपर सात साल मुकदमा चला था। ज्ञान की स्थापित परिभाषा के उल्लंघन के आरोप में गैलेलियो का हश्र सर्वविदित है। रूसो को अपने उपन्यास एमिली में चर्च नियंत्रित शिक्षा की आलोचना के लिए फ्रांस छोड़कर भागना पड़ा। कहने का मतलब जो भी शासकवर्ग की ज्ञान की परिभाषा का अतिक्रमण करता है उसे दंडित किया जाता है, चाहे वह ब्रूनो, गैलेलिओ, रूसो हों या हैदराबाद विश्वविद्यालय तथा जेएनयू के शिक्षक-छात्र हों।
नागपुर से संचालित मौजूदा सरकार ने सत्ता की बागडोर संभालते ही शिक्षा तथा जमीन के कानूनों में तब्दीली शुरू कर दी। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, राज्य सभा में बहुमत की कमी के चलते पारित नहीं हो सका। प्रस्तावित शिक्षा नीति को संसद में पेश किए बिना ही, आज्ञाकारी, ‘स्वायत्त’् विश्वविद्यालय आयोग (यूजीसी) तथा मानव संसाधन मंत्रलय के फरमानों के जरिए, उसके प्रावधानों को उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू करना शुरू कर दिया है। इसके विरोध में शिक्षक तथा छात्र लगातार आंदोलित हैं। इस क्रम में यूजीसी पर 16 मई को हजारों शिक्षकों ने धरना दिया। फरवरी में, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) के नेतृत्व में महीनों से चल रहे ऑक्यूपाई यूजीसी आंदोलन को पटरी से उतारने के लिए, खोखले नारेबाजी में परिभाषित देशभक्ति का उन्माद खड़ा करके उच्च शिक्षा परिसरों पर धावा बोल दिया। रोहित वेमुला की शहादत से उपजे राष्ट्रव्यापी छात्रें के उभार तथा हैदराबाद तथा जेएनयू के शिक्षक-छात्र आंदोलन के दमन पर काफी लिखा जा चुका है, उस पर चर्चा इस लेख का विषय नहीं है।
1833 में ब्रिटिश संसद में भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली लागू करने के पक्ष में बोलते हुए मैकाले ने कहा था कि इससे (शिक्षा पद्धति लागू करने से) बिना अपनी भौतिक उपस्थिति के अंग्रेज 1000 साल तक भारत पर बेरोकटोक राज कर सकेंगे। कितनी सही निकली मैकाले की भविष्यवाणी। औपनिवेशिक साम्राज्यवाद तथा विश्वबैंक-अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष संचालित नवउदारवादी साम्राज्यवाद में यह फर्क है कि अब किसी लॉर्ड क्लाइव की जरूरत नहीं है, सारे सिराजुद्दौला भी मीर जाफर बन गये हैं। यानी ऐतिहासिक रूप से, शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान को शासक वर्ग हित के सीमित दायरे में परिभाषित कर उस पर एकाधिकार स्थापना से वर्चस्वशाली के वर्चस्व को बरकरार रखना और मजबूत करना है। जैसा ऊपर मार्क्स के हवाले से कहा गया है, पूंजीवाद माल का ही नहीं विचारों का भी उत्पादन करता है। युगचेतना के निर्माण तथा पोषण में शिक्षा की निर्णायक भूमिका होती है। ऐंतोनियो ग्राम्सी के शब्दों में, शिक्षा शासक वर्ग के वर्चस्व के लिए जैविक एवं परंपरागत बुद्धिजीवी पैदा करती है। मुख्यधारा से ही विद्रोही धाराएं भी निकलती हैं। विद्रोही विचारों के प्रसार को रोकने का शासक वर्ग हर संभव उपाय करता है, क्योंकि युगचेतना को चुनौती इसके वर्चस्व को चुनौती है।
विश्वबैंक के दबाव में भूमंडलीय पूंजी की हितपूर्ति में जो नीतिगत तथा संस्थागत परिवर्तन मनमोहन सरकार, शायद लोकलज्जा की वजह से, मंद गति से कर रही थी, मोदी सरकार ने बागडोर संभालते ही आक्रामक ढिठाई से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। पिछली शताब्दी के तीसरे दशक के अंतिम सालों में शुरू हुए उदारवादी पूंजीवाद के संकट का स्रोत अतिरिक्त उत्पादन था। अधिकतम मुनाफे के सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था में शोषणपूर्ण उत्पादन-विनिमय प्रणाली के चलते, कामगर वर्ग तबाही के कगार पर था तथा बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही थी। समाज के व्यापक तबके में क्रयशक्ति के अभाव से मांग-आपूर्ति का समीकरण गड़बड़ा गया और पूंजीवाद ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गया। इस संकट का समाधान निकला कीन्स के अर्थशास्त्र से जिसके सिद्धांतों पर अहस्तक्षेपीय संवैधानिक राज्य की जगह कल्याणकारी राज्य ने ली। कल्याणकारी राज्य की मिश्रित अर्थव्यवस्था में तर्कशील मानव संसाधन की आवश्यकता के लिए स्वायत्त उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना हुई तथा पहले से ही मौजूद संस्थानों को पुनर्गठित किया गया। पाठ्यक्रम की रूपरेखा तथा क्लासरूम की पढ़ाई से स्वतंत्र, विश्वविद्यालय उन्मुक्त चिंतन-मनन_ विचार-विमर्श_ शोध-अन्वेषण तथा अन्याय के विरुद्ध विचार-निर्माण के केंद्र भी हैं। इंसानी दिमाग के गतिविज्ञान के नियम पूरी तरह निर्धारित, नियंत्रित नहीं किये जा सकते। उन्हें पाठ्यक्रम की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। इतिहास गवाह है कि शिक्षा की मुख्यधारा से ही विद्रोही, वैकल्पिक धाराएं भी प्रस्फुटित होती हैं।
जहां उदारवादी पूंजीवाद के संकट की जड़ में आमजन की क्रयशक्ति की कमी से, अतिरिक्त उत्पादित माल का संकट था, नवउदारवादी भूमंडलीय पूंजीवाद का संकट फायदेमंद, सुरक्षित निवेश के नीड़ की तलाश में अतिरिक्त पूंजी का है। रीयल एस्टेट के बाद शिक्षा को निवेश का सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र माना जा रहा है। कहने का मतलब कि वर्चस्व की हिफाजत के लिए जैविक तथा पारंपरिक बुद्धिजीवी पैदा करने की शिक्षा की भूमिका में एक अतिरिक्त आयाम और जुड़ गया, व्यावसायिक आयाम। विश्वबैंक द्वारा इसे खरीद-फरोख्त की व्यापारिक सेवा के रूप में गैट्स में शामिल करने के पहले से ही शिक्षा अत्यंत लाभकारी व्यवसाय बन चुका है। सारे कॉरपोरेट, खासकर रीयल एस्टेट के कारोबारी,‘‘ज्ञान’’ के प्रसार में जी-जान से जुट गये हैं। यदि विश्वबैंक अपने मंसूबे में कामयाब रहा तो अन्य उपक्रमों की ही तरह शिक्षा का भी पूर्ण कॉरपोरेटीकरण हो जाएगा तथा उसकी अंतःवस्तु की बात छोड़िए, उच्च शिक्षा गरीब तथा दलित-आदिवासियों की पहुंच से ही बाहर हो जायेगी और शैक्षणिक कर्ज अतिरिक्त आवारा पूंजी का एक और ठिकाना बन जायेगा।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, राज्य के वैचारिक औजारों द्वारा साम्यवाद विरोधी अभियान के बावजूद अमेरिका के विश्वविद्यालय परिसर क्रांतिकारी विमर्श तथा गतिविधियों के केंद्र के रूप में उभर रहे थे। शीत युद्ध में अमेरिका और सोवियत संघ आपस में नहीं युद्ध कर रहे थे बल्कि अपने-अपने आंतरिक ‘शत्रुओं’ से निपट रहे थे। शीतयुद्ध के आवरण में सोवियत संघ के साथ साम्यवादी विचारधारा को ही राष्ट्रीय दुश्मन घोषित कर शिक्षा संस्थानों पर हमला बोल दिया गया था। देशद्रोह का हव्वा खड़ा कर कम्युनिस्टों तथा उनके समर्थकों की धर-पकड़ शुरू हो गयी थी। भारत के मौजूदा यूएपीए की ही तरह खतरनाक पैट्रियाट तथा अन्य काले कानूनों के तहत तमाम बुद्धिजीवियों, फिल्मकारों, शिक्षाविदों को निशाने पर लिया गया। आइंस्टाइन की निगरानी के लिए एफबीआई में एक अलग सेल थी लेकिन सेलिब्रिटी स्टेटस ने उन्हें बचा लिया। मैनहट्टन परियोजना से जुड़े रहे रोजेनबर्ग पति-पत्नी को परमाणु बम से संबंधित फार्मूला लीक करने के आरोप में मौत की सजा दे दी गयी। हजारों शिक्षकों तथा छात्रें को प्रताड़ित किया जा रहा था। ऩई शिक्षा नीति में प्रणाली तथा पाठ्यक्रम ऐसे बनाए गये जिससे चिंतनशीलता को कुंद कर राज्य पर बौद्धिक निर्भरता सिखायी जा सके। अमेरिकी अपनी शिक्षा पद्धति का मजाक उड़ाते हुए उसे ‘बहरा बनाने की प्रक्रिया’ (डंबिंग प्रॉसेस) कहते हैं।
नरेंद्र मोदी की सरकार ने सत्ता की बागडोर संभालते ही शिक्षा नीति में बदलाव तथा परिसरों पर हमला शुरू कर दिया। जिस तरह कोई अंतिम सत्य नहीं होता, उसी तरह कोई अंतिम ज्ञान नहीं होता। ज्ञान एक निरंतर प्रक्रिया है। हर पीढ़ी पिछली पीढियों की उपलब्धियों तथा योगदानों को सहेज कर उसे आगे बढ़ाती है। वैचारिक द्वंद्व इस प्रक्रिया को गति देता है। मैं अपनी पहली क्लास में, हर साल, कोर्सेतर अन्य बातों के साथ दो बातें जरूर बताता हूं। पहली कि किसी भी ज्ञान कि कुंजी है, सवाल-दर-जवाब-दर-सवाल, अपने वैचारिक संस्कारों से शुरू कर अनपवाद हर बात पर सवाल। दूसरी बात कि उच्च शिक्षा की ये संस्थाएं ज्ञान देने के लिए नहीं बनी हैं। इनका वास्तविक मकसद विद्यार्थियों को ऐसी सूचनाओं एवं दक्षताओं से लैस करना है जिससे व्यवस्था को बरकरार रखा जा सके, यद्यपि घोषित उद्देश्य चिंतनशील नागरिक तैयार करना है। ज्ञान के लिए अलग से प्रयास करना पड़ता है। इसी अलग से प्रयास की जुर्रत में मोदी सरकार तथा संघ गिरोह ने देशद्रोह का हव्वा खड़ा करके हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा जेएनयू पर पूर्वनियोजित हमला बोल दिया। इन विश्वविद्यालयों से ही चिंतनशील इंसान भी निकलते हैं तथा विद्रोह की आवाज बुलंद करते हैं, शिक्षा के चलते नहीं शिक्षा के बावजूद।
वैसे तो विश्व बैंक के आदेशानुसार, शिक्षा के पूर्ण उपभोक्ताकरण तथा व्यावसायीकरण का सिलसिला कहीं लुके-छिपे, कहीं खुले-आम, उसी समय शुरू हो गया था जब नरसिंह राव सरकार ने 1991 में डव्लूटीओ प्रस्तावित भूमंडलीकरण के प्रस्तावों पर दस्तखत किया था। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार के शासनकाल में, जब शिक्षा मंत्रलय, मानव संसाधन मंत्रलय बन गया तब से यह सिलसिला धड़ल्ले से खुलेआम हो गया। पिछले ढाई दशकों में इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट के तमाम निजी कालेज तथा विश्वविद्यालय कुकुरमुत्तों की तरह देश के कोने कोने में उग आए। दिल्ली में इन शिक्षण दुकानों को संबद्धता दिलाने के लिए, 1998 में सुषमा स्वराज के तहत भाजपा शासन काल में, राज्य विश्वविद्यालय के रूप में इंदप्रस्थ विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। 1995 में विश्व बैंक ने शिक्षा को सेवाओं के व्यापार पर समस्त समझौता (गैट्स) में व्यापारिक सेवा के रूप में शामिल कर लिया। यूपीए सरकार इस दस्तावेज पर दस्तखत को सिद्धांततः राजी थी लेकिन शायद शैक्षणिक जगत में व्यापक विद्रोह के भय से इस पर दस्तखत नहीं कर पाई।
2015 में नैरोबी में एनडीए सरकार इस पर दस्तखत कर आई। इसके लिए पथ प्रशस्त करने के लिए सरकार ने शिक्षानीति में व्यापक फेर-बदल शुरू कर दिया तथा उच्च शिक्षा संस्थानों पर तीन तरफा हमला। शिक्षा नीति में परिवर्तन, उच्च शिक्षा संस्थानों के मुखिया के पद पर संदिग्ध शैक्षणिक योग्यता वाले आरएसएस पृष्ठभूमि के व्यक्तियों की नियुक्ति तथा शिक्षक-छात्रें के प्रतिरोध का दमन। दमन में आरएसएस गिरोह की छात्र इकाई एबीवीपी पांचवे कॉलम का काम करती है, जैसा कि हैदराबाद तथा जेएनयू के उदाहरणों से स्पष्ट है। शिक्षा को छिन्न-भिन्न करने की कवायद पिछली, यूपीए सरकार के समय ही शुरू हो गयी थी। मौजूदा सरकार उस एजेंडे को और आक्रामक तरीके से लागू कर रही है।
पिछली सरकार के कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्यालय आनन-फानन में, कोर्स परिवर्तन के सारे स्थापित मानदंडों को धता बताते हुए, हड़बड़ी में चार-साला स्नातक कार्यक्रम (एफवाईपी) शुरू कर दिया था जिसका विश्वविद्यालय समुदाय ने व्यापक विरोध किया। यूपीए शासनकाल के इस विरोध में भाजपा समर्थक संगठन एनडीटीएफ भी था। मोदी सरकार के आते ही इसे रामबाण बताने वाले, विश्वविद्यालय आयोग के अध्यक्ष को यह कार्यक्रम नियमों का उल्लंघन लगा। चार साला कार्यक्रम रद्द कर उसे तीन साला में बदल दिया गया तथा कुछ ही साल पहले शिक्षकों तथा छात्रें के विरोध के बावजूद वार्षिक प्रणाली की जगह थोपी गई सेमेस्टर प्रणाली की वापसी हो गई। साल भीतर ही सरकार ने शिक्षानीति में आमूल परिवर्तन शुरू कर दिया। केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम समेत प्रस्तावित उच्च शिक्षानीतियां, यदि पारित हो गयीं तो विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता नष्ट हो जायेगी तथा चिंतन-मनन एवं शोध-अन्वेषण के ये केंद्र कुशल कारीगर पैदा करने के कारखाने बन जायेंगे। विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र से कारीगरी सिखाने के वर्कशॉप बन जाएंगे।
यह लेख इस बात से खत्म करना चाहूंगा कि इंसान अनुभव, अध्ययन, प्रयोग तथा दिमाग के प्रयोग से ज्ञान अर्जित करता है। शिक्षा शासक वर्ग के विचारों को युग का विचार बताकर शासक वर्ग के हित में युगचेतना का निर्माण करने तथा बरकरार रखने के मकसद से ज्ञान को एक खास दिशा में परिभाषित करती है, शासक विचारों के प्रसार से युग चेतना का निर्माण करती है। देश भर में जारी छात्र आंदोलन युगचेतना के विरुद्ध सामाजिक चेतना के जनवादीकरण की दिशा में एक निर्णायक पहल है। त