काव्य-संवेदना का विस्तार करती कहानियां

स्वप्निल श्रीवास्तव ऐसे कवि हैं जिन्होंने कविता के साथ कहानियां भी लिखी हैं। ‘एक पवित्र नगर की दास्तान’ उनकी कहानियों का पहला संग्रह है। इसमें अठारह कहानियां संकलित हैं। अपने कथा लेखन के बारे में स्वप्निल कहते हैं कि जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्त करने के लिए कविताएं ही काफी नहीं हैं। इसलिए जो कुछ कविताओं में कहने से रह गया, उसके लिए कहानियां अच्छा माध्यम है। इन्हें पढ़ते हुए कविता का आस्वादन होता है। ये आकार में जितनी छोटी हैं, संवेदनात्मक धरातल पर उतनी ही बड़ी हैं। हम रोज-ब-रोज या कहिए अक्सरहां जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से गुजरते हैं, समस्याओं का सामना करते हैं और स्थितियों-परिस्थितियों से टकराते हैं, इनका हमारे मन-मस्तिष्क पर असर होता है। ये संवेदित करती हैं। देखने में सामान्य सी लगती हैं परंतु इनमें जीवन के बड़े व गहरे तत्व होते हैं। स्वप्निल की कहानियों की ये ही विषय-वस्तु हैं। संग्रह की आधी कहानियां अतीत के किसी ऐसे ही प्रसंग या घटना पर आधारित हैं जिनमें मीठी लेकिन दुर्लभ यादें हैं। ये अतीत की स्मृतियों को खंगालती हैं। उन्हें जीवित रखती हैं क्योंकि इनमें अपना इतिहास होता है जो वर्तमान का कारण है। साथ ही इनमें बदलते हुए समय की आहट है।
‘मां का पनडब्बा’ की मां तो नहीं रही लेकिन पनडब्बा का होना उनके होने की तरह है जो अपने समय की कहानी कहता है। कहानी इस बदलाव को भी रेखांकित करती है कि कैसे बाजार ने मनु”य की जरूरतों पर कब्जा कर लिया है जिसमें ‘पनडब्बा’ जैसी चीजें विलुप्त हो गयीं। इसी तरह ‘मरकहवा’ उन दिनों की कहानी है जब खेतों की जुताई बैलों से होती थी और दरवाजे पर बैल का होना शान समझा जाता था। किसान के लिए बैल उसके बेटे से कम नहीं था। ‘दादा बैल को बैल नहीं सहोदर समझते थे’ जानवरों के प्रति ऐसी संवेदनशीलता थी। इसी तरह ‘चीटियां’ कहानी उन अच्छी आदतों को सामने लाती है जिसमें मनुष्य सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचता बल्कि उन जीव-जन्तुओं के बारे में भी सोचता है जिनका जीवन हमसे जुड़ा है। ‘ताहिर अली की रामलीला’ ऐसी रामलीला है जिसमें ताहिर अली सीता का रोल करते हैं और सबके दिल में अपनी जगह बनाते हैं। यहां धर्म कोई बाधा नहीं। कहानी हमारी मिली-जुली संस्कृति को सामने लाती है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कहानी की चिंता अतीत के उन मूल्यों को बचाने की है जो उदार व मानवीय हैं और जो विलुप्त हो रहे हैं। वहीं, वे रूढ़ियों पर निर्ममता से प्रहार भी करते हैं। ‘कुलगुरु का आगमन’ ऐसी ही कहानी है। समाज में जिस तरह ‘कुलगुरु’ के नाम पर रूढ़ियों को प्रतिष्ठित किया जाता है, धाार्मिक अनुष्ठानों के द्वारा अवैज्ञानिकता व अतार्किकता का पक्षपोषण हो रहा है और यह प्रवृत्ति बढ़ रही है, संस्था का रूप ले रही है, कहानी इस वास्तविकता को सामने लाती है और पाठकों को संदेश देती है कि ये रूढ़ियां सामंती अवशेष है जो हाथी की लीद की तरह है जो घर व दरवाजे पर ही गंदगी नहीं फैला रही है बल्कि यह पूरे समाज को प्रदूषित कर रही है। ऐसे में इनका तिरस्कार व तर्क और विज्ञान के आधार को प्रबल करने की जरूरत है। इस तरह स्वप्निल के दृष्टिकोण में अतीत न संपूर्ण आलोच्य व त्याज्य है और न सारा ग्रहण योग्य।
स्वप्निल अपनी कहानियों के माध्यम से वर्तमान समाज और जीवन की समस्याओं के साथ इस सच्चाई से भी रूबरू कराते हैं कि व्यवस्था व नौकरशाही में आम आदमी किस तरह पिस रहा है। संग्रह की पहली कहानी है ‘एक पवित्र नगर की दास्तान’ । यह ऐसे धार्मिक नगर की कहानी है जिसके बारे में मान्यता है कि ईश्वर यहां पैदा हुआ। इस पवित्र नगर की विशेषता है कि यहां भोले-भाले लोग आते और उन लोगों का चारा बन जाते जो धर्म का धांधा चलाते, पाखंड करते। इस नगर की किसी को चिंता नहीं। इसकी वजह से नगर दुर्दशा का शिकार है। एक बड़ा अधिकारी आता है। वह इसे साफ करने का भगीरथ प्रयत्न करता है पर यह प्रयत्न व्यवस्था का शिकार हो जाता है तथा अधिकारी भी समर्पण कर देता है। यही ‘पवित्र नगर’ की सच्चाई है, प्रकारांतर से इस व्यवस्था की सच्चाई जो दिखती है, वह सच नहीं होती। कहानी इस संदेश के साथ समाप्त होती है ‘अक्सर बड़े अभियानों की परिणति बुरे नतीजों में होती है’। आकर्षक नारे और बड़ी योजनाएं भ्रम पैदा करने और आम लोगों को ठगने का मात्र जरिया है।
‘एक स्त्री का जीवन’ किसी एक स्त्री का नहीं बल्कि उन स्त्रियों का जीवन है जो आगे बढ़ने की इच्छाएं संजोए, अपने लिए रास्ता बनाती हैं। अकेलापन उनके लिए असुरक्षा का पर्याय है। उन्हें कई समझौते-समर्पण करने पड़ते हैं। समाज ऐसा है जहां भेड़िये अपने पंजे में दबोचने को बैठे हैं। कहानी स्त्री विरोधी समय और समाज के साथ स्त्री-जीवन के संघर्ष को उजागर करती है। इसके साथ ही स्त्री व पुरुष के उस स्वाभाविक रिश्ते को रेखांकित करती है जो सम्मान और बराबरी का हो सकता है।
‘कंधों पर तोता’ और ‘अमरूद का पेड़ और सुग्गे’ में कविता-सा प्रवाह है। इनका आरंभ अत्यंत काव्यमय है तो अंत उतना ही संवेदित करने वाला। उदारीकरण के इस दौर में घर कैसे विलुप्त हो रहा है, उसकी जगह भवन, इमारतें और कोठियां ले रही हैं और घर के खत्म होने से हमारे जीवन का क्या-क्या उजड़ रहा है, इस पीड़ा को कहानी पूरे आवेग से व्यक्त करती है। घर की आंगन में लगे अमरूद के इस पेड़ पर फल-फूल क्या आते, भौरों का गुनगुनाना, तितलियों, पंक्षियों व सुग्गों का झुण्ड में आना और उनकी चहचहाहट से घर आंगन का गुलजार हो जाना। इन सबसे मिलकर बनता है घर। इसीलिए तो आंगन से अमरूद के पेड़ का कटना सिर्फ एक पेड़ का कटना नहीं है, यह उस घर का उजड़ना है जिसमें मधुर स्मृतियां हैं, बच्चों के झूले हैं, बहुतों का जीवन है।
उदारीकरण के इस दौर में न सिर्फ चीजें बदल रहीं बल्कि उनके मायने भी, आदमी के जीने व रहने के तौर-तरीके ही नहीं उसके सोच व विचार भी बदल रहे हैं। इस तरह स्वप्निल की कहानियां गहरी संवेदना से भरी हैं और इन्हें पढ़ते हुए यही लगता है कि इनमें उनकी कविताओं का ही विस्तार हो रहा है।