हमारे बारे में

‘समकालीन तीसरी दुनिया’ और सामाजिक-राजनीतिक सरोकार

आनंद स्वरूप वर्मा

‘समकालीन तीसरी दुनिया का पहला अंक मार्च 1980 में प्रकाशित हुआ जो अफगानिस्तान पर केन्द्रित था। पत्रिका का घोषित उद्देश्य ‘महाशक्तियों के प्रभुत्ववाद के खिलाफ तीसरी दुनिया का प्रतिरोध’ था. भारत के मीडिया की और खास तौर पर हिन्दी मीडिया की यह प्रवृत्ति रही है कि वह अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि के बारे में भरपूर जानकारियां देता है लेकिन बांग्लादेश,  भूटान,  बर्मा आदि पड़ोसी देशों के बारे में उसने एक अजीब किस्म की उदासीनता का रवैया अपना रखा है। यह प्रवृत्ति काफी दिनों से जारी है जो अभी भी देखी जा सकती है। पाकिस्तान के बारे में हमें काफी खबरें मिल जाती हैं लेकिन उसके अलग कारण हैं। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ निकालते समय हमने यह सोचा था कि पड़ोसी देशों की घटनाओं से पाठकों को अवगत कराया जाए। इसके अलावा जिस समय इसका प्रकाशन शुरू किया गया हमारे सामने मुख्य रूप से निम्न उद्देश्य थेः

1.  हिन्दी में ऐसी पत्रिका के अभाव को दूर करना जो भारत सहित तीसरी दुनिया के देशों में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी और हर तरह के जनतांत्रिक आंदोलनों की जानकारी दे और जानकारी इस तरह दी जाय जिससे भारत की संघर्षशील शक्तियां इन देशों में चल रहे संघर्षों के साथ मानसिक तौर पर तादात्म्य स्थापित कर सकें।

2.  राजनीति, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उन प्रवृत्तियों को उजागर किया जाय जो इन संघर्षों को अपने माध्यमों के जरिए अभिव्यक्ति दे रही हों।

3.  दोनों महाशक्तियों अर्थात सोवियत संघ और अमेरिका के बीच दुनिया के देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने की होड़ का पर्दाफाश करना।

हमनें महसूस किया कि हिन्दी में ऐसी कोई पत्रिका नहीं है और इस कमी को पूरा करने के लिए तीसरी दुनिया का प्रकाशन शुरू किया गया। पहले अंक के समय से ही मैं पूरी तरह आश्वस्त था कि इस तरह की पत्रिका के पाठकों की संख्या कम नहीं है। हिन्दी भाषी क्षेत्र का होने के नाते हमलोगों को यह लाभ तो प्राप्त ही है कि अगर हम कायदे से किसी गंभीर पत्रिका को निकालें तो उसके पाठक बहुत बड़ी संख्या में मिलेंगें। ‘दिनमान’ ने इसे पहले ही साबित कर रखा था। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से निकलने वाली इस साप्ताहिक पत्रिका ने हमेशा पाठकों को गंभीर सामग्री दी और इसने पत्रकारिता तथा व्यवसाय दोनों में कीर्तिमान स्थापित किया। ‘दिनमान’ की सफलता हमारे लिए एक बहुत बड़ी बात थी। इसके साथ इस बात पर भी हमने गौर किया कि 1975 से 1977 के दौरान अर्थात आपातकाल के दिनों में जब इसने इंदिरा गांधी के 20 सूत्री और संजय गांधी के 25 सूत्री कार्यक्रमों पर सकारात्मक टिप्पणी दी तो इसकी साख काफी घट गयी। जेपी आंदोलन के समय इसका प्रसार अपने चरम पर था। इससे एक बात तो स्पष्ट हुई कि आंदोलनों के दौरान लोगों के अंदर पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। ऐसा भी होता है कि आंदोलन से पत्रिका को और पत्रिका से आंदोलन को मदद मिलती है। दोनों के संबंध अन्योनाश्रित हैं।

जिस समय हमने ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ का प्रकाशन शुरू किया, लगभग जीरो साधन थे। सिंगिल कलर कवर और अंदर के पृष्ठ न्यूज प्रिंट पर लेटर प्रेस में छपे थे  लेकिन सिंगिल कलर में ही इसके कवर को काफी आकर्षक बनाया गया। पाठकों की रुचि के प्रति मैं इतना आश्वस्त था कि पहले अंक का प्रिंट ऑर्डर 2000 दिया जबकि बिना किसी अपवाद के लघु पत्रिकाएं 1000 ही छपा करती थीं। इसकी कीमत 1 रुपए रखी गयी। इसकी वजह यह थी कि मैं पत्रिका को केवल समान विचार वाले पाठकों तक सीमित नहीं रखना चाहता था। बुक स्टॉल पर विभिन्न व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच रखे जाने पर यह अलग से दिखायी दे, ऐसा इसका स्वरूप बनाना जरूरी था। मैं चाहता था कि स्टॉल पर खड़ा ग्राहक एक बार पत्रिका को उठाकर देखे। देखने के बाद मूल्य देखकर वापस न रख दे इसलिए इसकी कीमत महज एक रुपए रखी गयी थी। मेरा यह सोचना सच निकला और जिन स्टॉल्स पर पत्रिका रखी गयी थी वहां शत-प्रतिशत बिक्री हुई। स्टॉल्स पर भेजते समय मैंने 500 प्रतियां सुरक्षित रख ली थीं क्योंकि मुझे पता था कि इसकी मांग कुछ नए क्षेत्रों से आ सकती है और ऐसा हुआ भी। बिहार के अनेक इलाकों से इसकी मांग आयी और अंत में हमारे पास रिकॉर्ड के लिए केवल 10 प्रतियां बची रहीं।

दूसरे अंक में कवर रंगीन कर दिया था लेकिन यह दो रंगों तक ही सीमित था। प्रिंट ऑर्डर भी 2000 ज्यादा बढ़ा दिया गया था और पत्रिका का मूल्य अब 2 रुपए हो गया था।

इन सबके बावजूद इस तरह इस पत्रिका को निकालना असंभव था क्योंकि इसमें विज्ञापन नहीं थे और लागत के बराबर मूल्य रखकर आप किसी पत्रिका को केवल बिक्री के सहारे नहीं चला सकते। तो भी पहले दौर में यह तकरीबन दो साल तक नियमित/अनियमित ढंग से निकलती रही लेकिन बंद होने से पहले इसने अपनी पहचान स्थापित कर ली थी। इसने विषय वस्तु के चयन, विश्वसनीय सामग्री और अलग हटकर विश्लेषण पर ही जोर नहीं दिया बल्कि प्रस्तुतिकरण में भी टाइप के चयन से लेकर फिलर्स देने की कला तक पर इसने काम किया। लेटर प्रेस में छपने के बावजूद पाठकों को ऐसा लगता था जैसे इसे ऑफसेट मशीन पर छापा गया हो क्योंकि लेखों की हेडिंग्स के ब्लाक बनवा कर लगाए जाते थे। इसमें नाम मात्र का खर्च आता था लेकिन इससे इसकी प्रस्तुति में कई गुणा वृद्धि हो जाती थी। मुझे पता था कि जबतक आपकी प्रस्तुति आकर्षक नहीं होगी और लंबे लेखों में पाठक को ‘रिलीफ’ नहीं मिलता रहेगा वह इसे पढ़ेगा नहीं। अन्य पत्र-पत्रिकाओं में गंभीर सामग्री का अभाव रहता था और इसके लिए संपादकगण यह कहते थे कि पाठक गंभीर सामग्री नहीं चाहते। मुझे याद है कि 1970 के दशक में एक जाने माने संपादक से मैंने जब अफ्रीका पर कुछ विशेष लिखने की पेशकश की तो उन्होंने बड़े मजाकिया अंदाज में कहा कि हिन्दी में यह सब कोई पढ़ने वाला नहीं है। इसके अगले अंक में ही मैंने उस पत्रिका में एक लंबी-चौड़ी परिचर्चा देखी जिसका विषय था ‘चोली कितनी ऊंची, साड़ी कितनी नीची’। वह सम्पादक जी किसी जमाने में दिनमान में भी काम कर चुके थे और उन्हें दिनमान की सफलता के पीछे गंभीर विश्लेषणात्मक सामग्री के प्रति पाठकों के रुझान की जानकारी जरूर रही होगी लेकिन उन्हें बराबर लगता था कि अगर हल्की-फुल्की सामग्री दी जाएगी तो सर्कुलेशन और भी ज्यादा बढ़ेगा। मेरी सोच इसके एकदम विपरीत थी और मैं मानता था, जो आज भी मानता हूं कि अगर हिन्दी में गंभीर और विश्लेषणात्मक सामग्री से भरपूर तथा साथ ही प्रस्तुतिकरण में एक नए सौंदर्यबोध के साथ कोई पत्रिका निकाली जाय तो उसका सर्कुलेशन एक वर्ष के अंदर आसानी से दो-तीन लाख तक पहुंच सकता है। शर्त यह है कि आपके पास इतनी पूंजी होनी चाहिए कि एक वर्ष तक आप सस्टेन कर सकें।

1980 का दशकः

1980 में जब इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ, वह शीतयुद्ध का दौर था और दोनों महाशक्तियों सोवियत संघ तथा अमेरिका के बीच जबर्दस्त होड़ चल रही थी। इस पत्रिका को न केवल उत्तर भारत और नेपाल में बल्कि उत्तर पूर्व के उन इलाकों में भी जहां नेपाली आबादी बसती थी काफी लोकप्रियता मिली। इसने अफगानिस्तान,  कंपूचिया,  इरीट्रिया,  जिम्बाब्वे,  दक्षिण अफ्रीका, एल सल्वाडोर, फिलीपीन्स, निकारागुआ आदि देशों में चल रहे मुक्ति संघर्षों पर विशिष्ट सामग्री प्रकाशित की। हिन्दी के अखबारों अथवा पत्र-पत्रिकाओं में इससे पहले इस तरह की सामग्री कभी भी देखने में नहीं आयी थी। यह दौर भी ऐसा था जब पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची थी और जनतांत्रिक ताकतें गुलाम बनाने वाली ताकतों के खिलाफ एक निर्णायक संघर्ष में लगी थीं।

देश के अंदर भी अनेक राज्यों में किसान संघर्ष तेज हो रहे थे। दमन और प्रतिरोध की लड़ाई जारी थी। इस पत्रिका ने राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राज्यों में सक्रिय संघर्षशील शक्तियों को एक मंच देने का प्रयास किया। मार्च 1980 में इसका प्रकाशन शुरू हुआ था और मई अंक में ही इसमें बांग्ला की लेखिका महाश्वेता देवी का एक महत्वपूर्ण इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। यह इंटरव्यू गोरख पांडेय, उर्मिलेश, चमनलाल, और आनंद स्वरूप वर्मा ने लिया था। हिन्दी में प्रकाशित होने वाला महाश्वेता देवी का यह पहला इंटरव्यू था। इसी अंक में अभय कुमार दुबे का एक लेख ‘कठोर फैसले देने की प्रवृत्ति’ प्रकाशित हुआ जो काफी चर्चित रहा। 1980 में ही एक अंक में भोजपुर के किसान संघर्ष पर महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित हुई और एक अन्य अंक में नागभूषण पटनायक की पेरोल पर रिहाई के बाद एक अच्छी रिपोर्ट सामने आयी। आंध्र प्रदेश की जेल में नागभूषण पटनायक एक लंबे अरसे से पड़े थे और उन्हें अदालत ने मौत की सजा दी थी। जेल में ही उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था और उन्हें आंध्र प्रदेश की सरकार ने चिकित्सा के लिए भारी पुलिस की निगरानी में दिल्ली स्थित एम्स में भेजा था। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ ने ‘सत्ता के संगीनों के जवाब में एक बुलंद आवाज नागभूषण पटनायक’ शीर्षक से शानदार रिपोर्ट प्रकाशित की। साथ में नागभूषण पटनायक की एक कविता भी थी जिसका अनुवाद पंकज सिंह ने किया था। इसी दशक में एक अवसर पर आंध्र प्रदेश के किसान नेता किस्टा गौड़ और भूमैया के बारे में, जिन्हें 1975 में आपातकाल के दौरान फांसी दे दी गयी थी, निशात कैसर लिखित दुर्लभ सामग्री प्रकाशित हुई। इसके साथ ही इन दोनों शहीद क्रांतिकारियों की स्मृति में विभिन्न भाषाओं में लिखी चार कविताएं भी प्रकाशित हुईं। ये कवि थे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (हिन्दी), चेरबंदा राजू (तेलुगु) सव्यसाची देव (बांग्ला) और उदयभानु (मलयालम)।

1980 में जनता पार्टी के कुशासन से त्रस्त होकर देशवासियों ने श्रीमती इंदिरा गांधी को दुबारा सत्ता में आने का मौका दिया। श्रीमती गांधी अपने इस नए अवतार में पहले के मुकाबले ज्यादा निरंकुश शासक साबित हुईं। उनकी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का गठन किया और कहा कि इस कानून का इस्तेमाल तस्करों और समाज विरोधी तत्वों के खिलाफ किया जाएगा। लेकिन इस कानून की चपेट में सबसे पहले जो लोग आए वे मजदूरों के बीच सक्रिय नेता थे। मध्य प्रदेश के दल्ली राजहरा में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चे के विख्यात नेता शंकर गुहा नियोगी की गिरफ्तारी हुई। अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं ने इस पर कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ ने इसे आवरण कथा का रूप दिया और दल्ली राजहरा के मजदूर आंदोलन पर तकरीबन 20 पृष्ठों की सामग्री प्रकाशित की। इस अंक की काफी चर्चा रही और पहली बार लोगों को इस मजदूर आंदोलन के बारे में इतने विस्तार से जानकारी मिली।

देश की विभिन्न जेलों और खास तौर से आंध्र प्रदेश की जेलों में बंद राजनीतिक बंदियों के बीच यह पत्रिका बहुत लोकप्रिय थी। हर महीने इन जेलों से सेंसर की मोहर लगे अंतर्देशीय पत्र और पोस्टकार्ड पत्रिका के कार्यालय में आते थे जिनमें टूटी-फूटी हिंदी में या अंग्रेजी में पत्रिका की मांग होती थी। जेल से छूटने के बाद कॉ. नागभूषण पटनायक ने एक बातचीत में हम लोगों को बताया कि किस तरह जेल में उनका ‘कम्यून’ इस पत्रिका का बेसब्री से इंतजार करता था और पत्रिका हाथ में आते ही लोग घेरा बना कर बैठ जाते थे और वह व्यक्ति, जिसकी हिंदी सबसे अच्छी होती थी लेखों को पढ़ कर लोगों को सुनाता था।

देश से बाहर नेपाली पाठकों के बीच यह पत्रिका काफी पढ़ी जाती थी हालांकि नेपाल के बारे में इसमें जानबूझ कर कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जाता था। नेपाल में वह निरंकुश पंचायती शासन का दौर था और जबर्दस्त सेंसरशिप थी। हमारे नेपाली साथियों ने ही सुझाव दिया था कि नेपाल पर कुछ न छापें। उनका कहना था कि अगर नेपाल पर कुछ भी आलोचनात्मक छपा तो पत्रिका नेपाल नहीं पहुंच पाएगी और हम तीसरी दुनिया के देशों में हो रहे घटनाक्रमों और घटनाओं के विश्लेषण से वंचित रह जायेंगे। मेची से महाकाली तक नेपाल के लगभग सभी 75 जिलों में इसके पाठक थे। इसकी थोक में तीन हजार प्रतियां तीन केंद्रों काठमांडो, विराटनगर और पोखरा जाती थी और फिर इन केंद्रों से इसका वितरण होता था। अकेले काठमांडो में इसकी दो हजार प्रतियां जाती थीं। नेपाल में हिंदी की दो ही पत्रिकाएं चर्चित थीं-‘दिनमान’ और ‘समकालीन तीसरी दुनिया’। इनमें से किसका प्रसार ज्यादा था-कहना मुश्किल है।   

‘समकालीन तीसरी दुनिया’ ने हमेशा वाम जनतांत्रिक राजनीति का पक्ष लिया लेकिन इस पक्षधरता के बावजूद इसने अपनी निष्पक्षता इस अर्थ में बनाए रखी कि किसी गुट विशेष को प्रमुखता न देते हुए जनतांत्रिक और वामधारा के विभिन्न संघर्षशील समूहों को इसने अपने पृष्ठों में स्थान दिया। 1982 में इंडियन पीपुल्स फ्रंट की स्थापना में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आईपीएफ के गठन से पूर्व ‘तानाशाही विरोधी राष्ट्रीय विचारगोष्ठी’ का आयोजन ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के बैनर तले ही हुआ था। इस विचार गोष्ठी में ही राष्ट्रीय संयोजन समिति का गठन हुआ और इसके संयोजक के रूप में आनंद स्वरूप वर्मा को फ्रंट की स्थापना के लिए सम्मेलन बुलाने की जिम्मेदारी दी गयी। पत्रिका के जिस अंक में इस विचार गोष्ठी की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी उसी में तमिलनाडु जनमोर्चा, उत्तर प्रदेश संयुक्त जनमोर्चा, बिहार राज्य जनवादी व देशभक्त मोर्चा, झारखंड सम्मेलन और विदर्भ सम्मेलन की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई जो अपने-अपने राज्यों में आईपीएफ के निर्माण में सक्रिय थे। अप्रैल 1982 के अंक में आईपीएफ के गठन की रिपोर्ट विस्तार से प्रकाशित हुई और इसी अंक में फिलीपीन्स के सशस्त्र संघर्ष पर भी रिपोर्ट देखने को मिली। इस अंक में सुमंत बनर्जी का एक महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुआ जिसका शीर्षक था ‘मारकोस की दोस्ती और इंदिरा गांधी ’। फिलीपीन्स की भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक जोसे मारिया सिसान की पांच कविताएं भी इस अंक में प्रकाशित हुईं जिनका अनुवाद पंकज सिंह ने किया था। समकालीन तीसरी दुनिया के प्रकाशन के इस पहले दौर में डी. प्रेमपति, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, त्रिनेत्र जोशी, मंगलेश डबराल, कंचन कुमार, अजय सिंह, गोरख पांडे, इब्बार रब्बी, मधुकर उपाध्याय, महेश्वर, मदन मोहन   उर्मिलेश, अभय कुमार दुबे, महाश्वेता देवी, हंसराज रहबर, नवेन्दु, श्रीकांत, सुरेश सलिल, प्रभाती नौटियाल, अनिल सिन्हा  जैसे अनेक लेखकों का सक्रिय सहयोग इसे मिलता रहा।

1990 का दशक

1990 आते-आते शीतयुद्ध की समाप्ति हो चुकी थी और सोवियत संघ के पतन के साथ दुनिया भर के वामपंथी खेमों में एक निराशा की स्थिति थी। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के प्रकाशन का यह दूसरा दौर अपेक्षाकृत ज्यादा संघर्षपूर्ण और चुनौतियों से भरा था। आर्थिक उदारवाद ने एक तरह के उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया था और अब पहले की तरह लेटर प्रेस में पत्रिका छाप कर केवल स्टॉल्स के माध्यम से बेचना संभव नहीं था। अब पत्रिका की लागत में वृद्धि हुई लेकिन विषय वस्तु की दृष्टि से इसको और विविधता मिली। आईपीएफ का भी लगभग विघटन हो चुका था और वाम शक्तियां पस्ती की हालत में थीं। लेकिन नवउदारवादी अर्थनीति और भूमंडलीकरण के खिलाफ दुनिया के विभिन्न देशों में और भारत में भी आंदोलन की सुगबुगाहट थी। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ ने इन आंदोलनों की शिनाख्त करनी चाही और लोगों को इनसे अवगत कराने का प्रयास किया। यही वजह है कि डंकल प्रस्ताव के कारण भारत की कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव को इसने एक अंक की कवर स्टोरी बनाया और इसे काफी पसंद किया गया। इस दशक में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने देश की सामाजिक संरचना को स्थायी तौर पर प्रभावित किया। भूमंडलीकरण के साथ-साथ समाज के सांप्रदायीकरण और राजनीति के अपराधीकरण का अजीब सा घालमेल देखने को मिला जिससे सबसे बुरी तरह समाज का वह तबका प्रभावित हुआ जो हाशिए पर पड़ा था।

1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस एक बहुत बड़ी घटना थी जिसने सामाजिक ताने-बाने को दहला दिया। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’  की पहल पर उस वर्ष 20 दिसंबर को दिल्ली से 60 बुद्धिजीवियों का एक दल अपना रोष व्यक्त करने लखनऊ गया और वहां के बुद्धिजीवियों के साथ मिल कर एक शांति रैली निकाली। इस अभूतपूर्व रैली में राजेंद्र यादव, सुरेंद्र प्रताप सिंह, डी. प्रेमपति, अशोक चक्रधर, अनिल शुक्ला, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सीमा मुस्तफा, ईश मिश्र, पंकज बिष्ट, अनिल चमड़िया,  जावेद नकवी, राजेश जोशी, अनिल चौधरी, विष्णु नागर, पीयूष पंत, वीरेंद्र सेंगर, राजीव भारद्वाज, जे. एस. सिद्धू, अजित अंजुम, अनूप सराया आदि के साथ लखनऊ से मुद्राराक्षस, विद्याभूषण, वीरेंद्र यादव, अजय सिंह, अनिल सिनहा, राकेश आदि ने भाग लिया। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के जनवरी 1993 के अंक में इस घटना पर उल्लेखनीय सामग्री दी गयी। इस अंक की कवर स्टोरी का शीर्षक था-‘शर्म से कहो तुम हिन्दू हो’ जिसे अनिल शुक्ला ने लिखा था। ‘चीते पर सवार आडवाणी’ शीर्षक संपादकीय और डी. प्रेमपति का लेख ‘जिन्नावाद की ही तरह खतरनाक आडवाणीवाद’ को पाठकों ने काफी सराहा। हमने तय किया कि नेपाल और पाकिस्तान का सर्वेक्षण कराया जाय और जनता को बताया जाय कि धर्म आधारित राष्ट्र में विकास और आम जनता की स्थिति कितनी दयनीय हो जाती है। भारत के एकतरफ हिन्दू राष्ट्र और दूसरी तरफ इस्लामिक राष्ट्र का अस्तित्व था और हम अपने पाठकों को यह बताना चाहते थे कि चौतरफा विकास के लिए जनतांत्रिक व्यवस्था कितनी जरूरी है। इसी को ध्यान में रखकर विशेष तौर पर संपादकीय टीम के एक सदस्य अनिल चमड़िया को नेपाल भेजकर सर्वेक्षण कराया गया और अगले अंक की आवरण कथा के रूप में ‘नेपालः हिन्दू राष्ट्र होने का दर्द’ शीर्षक से इसे प्रकाशित किया गया। हमारा बाद का अंक पाकिस्तान पर केन्द्रित था लेकिन इसका प्रकाशन संभव नहीं हो सका।

इस दशक के अन्य अंकों में मानव अधिकारों को प्रभावित करने वाले कई विषयों पर महत्वपूर्ण सामग्री दी गयी। आतंकवाद से निबटने के लिए बनाए गए कानून ‘टाडा’ के दुरुपयोग पर पुण्य प्रसून वाजपेयी ने एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट हमें भेजी जिसे कोई भी अखबार प्रकाशित करना नहीं चाहता था। हमने अक्टूबर 1993 के अंक में इसे प्रकाशित किया। इसी तरह हमने पत्रकार राजकुमार शर्मा से विशेष तौर पर उड़ीसा के उन इलाकों का सर्वेक्षण कराया जहां भूख से मरने की खबरें थीं। ‘कालाहांडी का सच’ शीर्षक से यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

1990 के समाप्त होते-होते पड़ोसी देश भूटान में न्यूनतम मानव अधिकारों की मांग को लेकर कुछ संगठनों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसके विरोध में निरंकुश राजतंत्र ने भीषण दमन चक्र चलाया। समूचे दक्षिण भूटान में बड़ी संख्या में लोग गिरफ्तार किए गए, आंदोलनकारियों के घरों में शाही भूटानी सेना के जवानों ने कहर बरपा दिया और तकरीबन साढ़े छह लाख की आबादी में से एक लाख से अधिक लोगों को जबरन देश से बाहर निकाल दिया गया। वे भूटान की सीमा पार कर भारत की सीमा में घुसे और यहां सीमा सुरक्षाबल तथा अन्य अर्धसैनिक बलों ने अपने ट्रकों में इन्हें मवेशियों की तरह लादकर नेपाल की सीमा में छोड़ दिया। बाद में संयुक्त राष्ट्र की देख-रेख में इनके लिए शरणार्थी शिविर स्थापित हुए।

भूटानी नागरिकों की इस दुर्दशा पर नेपाल के अखबारों में तो काफी कुछ प्रकाशित हुआ लेकिन भारत का मीडिया पूरी तरह मौन साधे रहा। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ ने इस मुद्दे पर पहल ली और सितंबर 1991 में नयी दिल्ली में एक सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें भूटान के कुछ विस्थापित राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा भारत के अनेक प्रबुद्ध लोगों ने भाग लिया। इसी बैठक में अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर के संरक्षण में ‘भूटान सॉलिडरिटी’ नाम से एक संगठन का निर्माण हुआ जिसका संयोजक आनंद स्वरूप वर्मा को बनाया गया। 1995 में इसी संगठन के बैनर तले पत्रकारों की एक टीम ने शरणार्थी शिविरों का सर्वेक्षण किया और विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। पत्रकारों की टीम के सदस्य थे—श्रीनन्द झा, विनोद अग्निहोत्री, ओमप्रकाश तपस, आनंद स्वरूप वर्मा और अभय शर्मा।   भूटानी शरणार्थियों की समस्या पर पत्रिका ने लगभग नियमित तौर पर सामग्री प्रकाशित की। भूटान के मानव अधिकारवादी नेता टेकनाथ रिजाल जेल में बंद थे और पूरे दशक के दौरान ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के जितने भी अंक निकले उनमें से अधिकांश में अंतिम पृष्ठ पर तस्वीरों के साथ जिन दो राजबंदियों की रिहाई की मांग प्रकाशित हुई वे थे भूटान के टेकनाथ रिजाल और बर्मा की आंग सांग सू की। नेपाल पर इस पत्रिका ने पर्याप्त सामग्री प्रकाशित की और हिन्दी पाठकों के लिए नेपाल के बारे में जानकारी का यह मुख्य स्रोत साबित हुआ। उस समय नेपाल में हमारे प्रतिनिधि वहां के प्रखर युवा पत्रकार कुंदन अर्याल थे जिनकी अनेक महत्वपूर्ण रपटें प्रकाशित हुईं। 

मार्च 1994 में पत्रिका का एक विशेष अंक निकला जो अफ्रीकी साहित्य और संस्कृति पर केन्द्रित था। इस अंक के एक खंड में नेपाल और भारत पर कुछ लेख थे और शेष में अफ्रीका पर। क्वामे न्क्रूमा, अमिल्कर कबराल, न्गुगी वा थ्योंगो के महत्वपूर्ण लेखों, डेनिस ब्रूटस की कविताओं और दक्षिण अफ्रीका तथा सेनेगल की कहानियों के साथ अफ्रीकी साहित्य की जानकारी देने वाला यह दुर्लभ अंक साबित हुआ। इससे पहले ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ ने नेल्सन मंडेला की तस्वीर के साथ पोस्टर छापे थे जिसमें दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति पीटर बोथा का वह प्रस्ताव था जिसे मंडेला ने ठुकरा दिया था जिसमें कुछ शर्तों के साथ रिहाई की बात कही गयी थी। उस समय तक मंडेला को जेल में 23 वर्ष हो चुके थे। यह पोस्टर हिंदी और अंग्रेजी में था और इसका देश भर में प्रसार हुआ।

1998 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ और हमारा मई 1998 का अंक ‘अब सांप्रदायिकता का नहीं, फासीवाद का खतरा’ के आवरण कथा के साथ प्रकाशित हुआ। इसमें सांप्रदायिकता के खिलाफ अनेक सामग्री के साथ शम्शुल इस्लाम और नीलिमा शर्मा का लेख ‘हिन्दू राष्ट्रवाद का वैचारिक दर्शन’ काफी पढ़ा गया। इसी अंक में पीयूष पंत ने किसानों की आत्महत्या से उपजे सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। नवंबर 1998 में भाजपा की शिक्षा नीति पर रोशनी डालते हुए ‘शिक्षा में घोल दी नफरत की राजनीति’ शीर्षक से राम शिरोमणि शुक्ल की रिपोर्ट आवरण कथा के रूप में प्रकाशित की गयी। इस अंक में ‘इस तरह पढ़ाया जाता है हिन्दुत्व’ (के.एन.पणिक्कर) और ‘लक्ष्मी के वाहनों की सरस्वती पूजा’  (प्रभाष जोशी) लेख काफी पढ़े गए।

पत्रकारिता में स्थिति यह हो गयी है कि बड़ी से बड़ी घटना कुछ दिनों तक चर्चा में रहती है और उसके बाद भुला दी जाती है। हमने हमेशा चाहा कि रिपोर्टिंग में किसी घटना विशेष का फालोअप जरूर किया जाना चाहिए ताकि पता चले कि आगे उस घटना से जुड़े पात्रों की क्या नियति हुई। इस क्रम में हमने ‘फालोअप’ के अंतर्गत एक स्तंभ की शुरुआत की और इसमें पहली रिपोर्ट बिहार के बेलछी गांव से थी जहां सत्ता से हटाए जाने के बाद 13 अगस्त 1977 को श्रीमती गांधी हाथी पर बैठकर बेलछी के लोगों की दुर्दशा देखने गयी थीं। हमने विशेष तौर पर पत्रकार नवेन्दु को उस गांव में भेजा और ‘बेलछी की वेदना 20 साल बाद शीर्षक’ से एक सचित्र रिपोर्ट प्रकाशित हुई। साधनों के अभाव में हम अपना यह स्तंभ जारी नहीं रख सके हालांकि आज भी इसकी जरूरत बनी हुई है।

1990 के दशक का अंतिम अंक दिसंबर 1998 का था जो भाकपा (माले) के करिश्माई नेता कामरेड विनोद मिश्र को समर्पित था। इसमें ‘कामरेड विनोद मिश्र और क्रांति का सपना’ शीर्षक आवरण कथा के साथ कई दुर्लभ सामग्री संकलित की गयी थी। इसी अंक में अनिल चौधरी और खुर्शीद अनवर द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गयी, ‘उनके फरोगे हुस्न से झमके हैं सबमें नूर’ शीर्षक से एक यादगार टिप्पणी भी प्रकाशित है जो गुजरात में पिराना की दरगाह पर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद द्वारा कब्जा किए जाने की घटना पर है।

2010 के बाद

अभी अगस्त 2010 से प्रकाशन का ताजा दौर शुरू हुआ है। यह ऐसा समय है जब बाजार की शक्तियां पूरी तरह हमारे देश की राजनीति को संचालित कर रही हैं और कॉरपोरेट घरानों द्वारा बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों की लूट चल रही है। इसके फलस्वरूप छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड आदि खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों में उथल-पुथल की स्थिति बनी हुई है क्योंकि केंद्र में बैठी सरकार की मदद से तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कॉरपोरेट घरानों ने खनिजों के दोहन के लिए सैकड़ों करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। पश्चिम बंगाल में सिंगूर और नंदीग्राम से लेकर छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा और उड़ीसा में पोस्को के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में एक खास तरह की समानता है और वह इस रूप में दिखायी देती है कि इन सभी स्थानों में बड़े उद्योगों को स्थापित करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को उजाड़ा जा रहा है। विस्थापन की समस्या ने अत्यंत गंभीर रूप ले लिया है और सरकार की इस नीति के खिलाफ जनता का प्रतिरोध लगातार हिंसात्मक रूप लेता जा रहा है। एक और समानता यह है कि इन सभी इलाकों में मुख्य आबादी आदिवासियों की है जिन्हें शुरू से ही भारतीय राजनीति में हाशिए पर डाल दिया गया है। इनके बीच जो लोग सक्रिय हैं उनके खिलाफ तरह-तरह के कानून बनाए जा रहे हैं और कहीं सचमुच तो कहीं अपनी सुविधा के लिए सरकार इन इलाकों को माओवाद प्रभावित इलाका घोषित कर रही है। इसमें सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि भारत में 1967 में नक्सलबाड़ी के किसान संघर्ष के साथ जिस आंदोलन की शुरुआत हुई थी और जिसे 1970 के दशक की समाप्ति तक सरकार ने लगभग मृत घोषित कर दिया था वह फिर ‘माओवाद’ के रूप में सामने आ गया है। यह दौर भीषण दमन और प्रतिरोध का दौर है।

ऐसे समय पत्रिका का प्रकाशन बहुत जोखिम भरा काम है क्योंकि आप कुछ भी अगर जनता के पक्ष में लिखेंगे तो उसे सरकारी भाषा में ‘राजद्रोह’ मान लिया जाएगा। इन सबके बावजूद अगर कोई जनपक्षधर  पत्रिका निकालनी है तो यह जोखिम उठाना पड़ेगा। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ यह जोखिम उठाती रही है और आगे भी इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान—ख़ास तौर पर भाजपा के खोल में आरएसएस के सत्ता में आने के बाद चुनौतियां और भी ज्यादा बढ़ गयी हैं। इधर के अंकों में मुशर्रफ अली ने आसान भाषा में अपने विश्लेषणों के जरिये मोदी सरकार की कॉरपोरेटपरस्त आर्थिक नीतियों की परत-दर-परत उधेड़ कर रख दी है। स्मार्ट सिटी पर उनके द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को लोगों ने काफी प्रचारित किया। इसी तरह सुभाष गाताडे और अभिषेक श्रीवास्तव ने हिंदुत्व के उग्र और विघटनकारी पक्ष पर लगातार लिखा। देश के दूर दराज के इलाकों में दमन और उत्पीडन का दंश झेलती, मेनस्ट्रीम मीडिया की पीलियाग्रस्त आँखों से ओझल जनता की पीड़ा को व्यक्त करने वाली कुछ शानदार फील्ड रिपोर्ट्स भी अभिषेक रंजन सिंह और अभिषेक श्रीवास्तव ने प्रस्तुत की जो पत्रिका की उपलब्धि है। इस कड़ी में अजय सिंह की कविता ‘राष्ट्रपति भवन में सूअर’ को भी याद किया जा सकता है। कश्मीर के कवि-पत्रकार निदा नवाज की कलम से कुछ अद्भुत रपटें भी हिंदी में पहली बार पढने को मिलीं जिनमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों कट्टरपंथियों की लानत-मलामत की गयी है.

इस दौर का अनुभव पहले से काफी भिन्न है। अभी देश के अंदर आंदोलन जैसी स्थितियां तैयार हो रही हैं लेकिन बड़े पैमाने पर कोई ऐसा आंदोलन नहीं है जो व्यापक आबादी को–खास तौर पर विशाल मध्य वर्ग को–प्रभावित कर सके। माओवादी आंदोलन ही ऐसा आंदोलन है जो दिखायी दे रहा है लेकिन जिसके खिलाफ नए-नए आंदोलन खड़ा करने की कोशिशें भी जारी हैं। जनता के अंदर महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर जो असंतोष पनप रहा है उसे निकालने के रास्ते ढूंढे जा रहे हैं। लालगढ़ में जिन दिनों सिंगूर के खिलाफ आंदोलन चल रहा था और टेलीविजन चैनल वहां के माओवादी आंदोलन को अपनी सुर्खियां बना रहे थे उन दिनों मध्य वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस आंदोलन की ओर कौतूहलपूर्ण मुद्रा लेकर आकर्षित हो रहा था। व्यवस्था के लिए यह एक खतरे की घंटी थी। इसके अलावा जगह-जगह छापों के दौरान खुफिया विभाग को प्राप्त माओवादी दस्तावेजों से यह पता चला था कि माओवादियों का एक शहरी एजेंडा है जिसे लागू करके वे मध्यवर्ग को या तो अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं या उन्हें न्यूट्रलाइज कर सकते हैं ताकि वे दुश्मन के खेमे में न जायं। ऐसी स्थिति में राज्य को कुछ ऐसे आंदोलनों की जरूरत पड़ गयी थी जिसे लोगों का गुस्सा निकालने के लिए सेफ्टी वाल्व की तरह इस्तेमाल किया जा सके। अन्ना हजारे का आंदोलन इसी कड़ी की एक शुरुआत थी।

एक पत्रिका के संपादक के रूप में इस तरह के आंदोलन बड़ी मुश्किल पैदा कर देते हैं। अगर आप इसका विरोध करते हैं तो भ्रम पैदा किया जाता है कि आप भ्रष्टाचार का साथ दे रहे हैं और अगर इसके साथ खड़े होते हैं तो आपको खुद को यह कनविन्स करना बहुत मुश्किल है कि इस आंदोलन का मकसद सचमुच भ्रष्टाचार को समाप्त करना है। एक राय आती है कि जनता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि हम सही अर्थों में जनता को परिभाषित करें और साहस के साथ अपनी बात रख सकें। जिस बड़े पैमाने पर देश में लोगों ने गणेश की मूर्ति को दूध पिलाने का अभियान चलाया वह भी तो जनता ही थी। तो क्या जनता का अर्थ कभी भी किसी एब्सोल्यूट रूप में हो सकता है? यह एक प्रमुख समस्या है जो बतौर संपादक सामने दिखायी देती है।

1980 के दशक में इस पत्रिका का सबसे ज्यादा प्रसार बिहार राज्य में था पर 2010 के बाद के दौर में बिहार का स्थान पंजाब ने ले लिया है जोकि अहिंदीभाषी राज्य है। इसके पीछे पंजाब में आज दलित आंदोलन, जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों का आंदोलन, सत्ताधारी वर्ग और हाशिये पर पड़े व्यापक जनसमुदाय के बीच अंतर्विरोध का तेज होना आदि कारण हो सकते हैं।

जहां तक लोगों के रेस्पांस का सवाल है, लोग पत्रिका को काफी पसंद कर रहे हैं क्योंकि हिन्दी में इन विषयों पर सामग्री देने वाली कोई पत्रिका नहीं है। पिछले छ: वर्षों के दौरान नेपाल पर जितनी सामग्री इस पत्रिका में प्रकाशित हुई है उतनी शायद ही कहीं और मिले। हमारे नेपाल प्रतिनिधि नरेश ज्ञवाली ने राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर अद्भुत रिपोर्टिंग की है। 

मैने जब इसका प्रकाशन शुरू किया था उस समय किसी ने मुझसे पूछा था कि सामग्री का चयन आप कैसे करते हैं। मैंने जवाब में कहा कि अगर आप तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया के सारे दफ़्तरों का एक चक्कर लगाएं और वहां संपादक की टेबुल के नीचे रखी रद्दी की टोकरी को जुटा लें तो उसमें से इतनी सामग्री आपको मिल जाएगी जो आपके कई अंकों की कवर स्टोरी हो सकती है। मैं आज भी इस बात को थोड़े संशोधन के साथ मानता हूं। आज मेनस्ट्रीम मीडिया की कवर स्टोरी और हमारी कवर स्टोरी (मसलन अन्ना हजारे या दंतेवाड़ा) एक हो सकती है लेकिन दोनों के विश्लेषण में जमीन आसमान का अंतर होगा। धीरे धीरे पाठकों को यह आदत डलवाने की जरूरत है कि वे हमारे विश्लेषण के प्रति दिलचस्पी लें। यही वजह है कि आज पत्रिका के साथ-साथ इसकी सामग्री को इंटरनेट, ब्लॉग्स और विभिन्न साइट्स के जरिए प्रचारित किया जाए। लोगों का रेस्पांस पहले की तुलना में आज ज्यादा है लेकिन उसमें आंदोलनात्मकता की कमी है। यह परिस्थितियों के कारण है। जैसे-जैसे देश में आंदोलन की स्थितियां बढेंगी इस तरह की पत्रिकाओं की मांग बढ़ती जाएगी। इसी विश्वास के साथ इसके प्रकाशन को अब तक जारी रखा गया। कोई भी पत्रिका क्रांति या आंदोलन नहीं करती। उसका काम लोगों की चेतना के स्तर को उन्नत करना है जिसका फायदा क्रांतिकारी ताकतें उठा सकती हैं। आज जबकि खबरों का बुरी तरह स्थानीयकरण हो गया है और इन्फॉर्मेशन टेक्नालॉजी के जबर्दस्त विकास के बावजूद लोग खबरों से कटते जा रहे हैं, इस तरह की पत्रिकाओं की जरूरत और भी ज्यादा बढ़ गयी है जो लोगों को एक दूसरे के क्षेत्र की खबरें दे सके। दूसरी बात यह है कि राज्य ने या व्यवस्था ने मिसइंर्फोमेशन या डिसइंर्फोमेशन को एक हथियार बना रखा है और इसका मुकाबला हम लोगों को ज्यादा से ज्यादा सही सूचनाओं और जानकारियों से लैस करके कर सकते हैं। तीसरी बात यह है कि ग्लोबलाइजेशन के अंदर एक बिल्ट इन मेकेनिज्म है- जनआंदोलनों की खबरों को ब्लैकआउट करना क्योंकि जनआंदोलनों की खबरों से निवेश के वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उसका सामना करने के लिए भी आज इस तरह की पत्रिकाओं की जरूरत है। इस तरह के प्रयास ही आगे चलकर एक वैकल्पिक सूचना तंत्र का रूप ले सकेंगे।